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यादों का झरोखा
याद आया फिर वो जमाना
जब बेटी मायके आती थी तो सारे मोहल्ले में रोनक और धूम हो जाती थी।
जब गेहूं साफ होते थे किट्टी पार्टी हो जाती थी।
जब हर दिन लैटर बोक्स चैक किया जाता था।
जब मुहल्ले की शादीयो में होटल के कमरे बुक नहीं होते थे
पड़ोसीयैं के घर में बिस्तर लग जाते थे।
जब शादी मे एक दिन का संगीत नहीं पूरे हफ्ते बधाई गाते थे।
जब शादी के निमंत्रण पत्र के साथ हल्दी चावल भिजवाते थे।
याद आता है कि जब बच्चो के जन्म दिन पर मोहल्ले की
महिलाएं खाना बनवाती थी। और बच्चा फूलों की माला
पहन फूले न समाता था किसी शहंशाह सा इतराता था।
जब छत पर किस के चिप्स पापड़ सूख रहे थे बताना था मुश्किल।
जब सर्दी की धूप में बुनाई की हर सलाई पर बातों का एक नया किस्सा।
याद आता है जब डाकिये का हमारे घर की ओर आना शुभ माना जाता था।
और याद आता है वो सर्दी में लंगड़ी टांग खेलना।
जब पेड़ हमारा बोझ उठाने को उत्साहित हो जाता था।
याद आया फिर वो जमाना जब टीचर हमें हमारी खूबियां नहीं, हमारी कमियां गिनवाया करते थे।
जब अमचूर की फांक ओर इमली खटटी नहीं मीठी लगती थी।
जब दिन में गन्ने खाकर ढेर लगा देते थे और रात में उसे जला कर दोस्तों के साथ हाथ सेकते थे।
जब गर्मीयो की छुट्टीयों में नाना नानी के घर में जाते थे
वो पैसेंजर ट्रेन में आलू की सब्जी पूड़ी और अचार खाते हुए जाते थे और पूरे साल फिर से इन्तज़ार करते थे
याद आता है जब कोई कजन नहीं होता था सारे भाई बहन होते थे। आज अचानक ही बैठे बैठे वो पुराना समय याद आ गया जो आज बहुत सुहाना लगता है।
सच है कि वो बचपन का समय दोबारा नहीं आता और एक टीस सी छोड़ जाता हैं।